Sach Na Bolna , Kavi Nagaarjun Hindi Kavita Sangrah, poems

सच न बोलना(कवी नागार्जुन /कविता संग्रह) मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को, डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को! जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा! सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा! जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है! … Read more

Mor Na Hoga …Ulloo Honge, Ek Vyaangayaatmak Kavita / Naagaarjun

मोर ना होगा……. उल्लू होंगे, एक व्यांगयात्मक कविता ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा तुम से … Read more

Bhul Jao Purane Sapne Ko (कविता), कवि नागार्जुन, Hindi Poem

भूल जाओ पुराने सपने को(कविता) कवि नागार्जुन सियासत में न अड़ाओ अपनी ये काँपती टाँगें हाँ, मह्राज, राजनीतिक फतवेवाजी से अलग ही रक्खो अपने को माला तो है ही तुम्हारे पास नाम-वाम जपने को भूल जाओ पुराने सपने को न रह जाए, तो- राजघाट पहुँच जाओ बापू की समाधि से जरा दूर हरी दूब पर … Read more

सृष्टि(Srishti) – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

सृष्टि(Srishti) – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत) [ads1] [ads2] मिट्टी का गहरा अंधकार, डूबा है उस में एक बीज वह खो न गया, मिट्टी न बना कोदों, सरसों से शुद्र चीज! उस छोटे उर में छुपे हुए हैं डाल–पात औ’ स्कन्ध–मूल गहरी हरीतिमा की संसृति बहु रूप–रंग, फल और फूल! वह है मुट्ठी में बंद किये … Read more

मैं सबसे छोटी होऊं – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

मैं सबसे छोटी होऊँ तेरी गोदी में सोऊँ तेरा आँचल पकड़-पकड़कर फिरू सदा माँ तेरे साथ कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ बड़ा बनाकर पहले हमको तू पीछे छलती है माँ हाथ पकड़ फिर सदा हमारे साथ नहीं फिरती दिन-रात अपने कर से खिला, धुला मुख धूल पोंछ, सज्जित कर गात थमा खिलौने, नहीं सुनाती हमें … Read more

15 अगस्त 1947 – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

15 August 1947 – Sumitranandan Pant

15 August 1947 By Sumitranandan Pant 15 अगस्त 1947 – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत) चिर प्रणम्य यह पुष्य अहन, जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नव भारत, फिर चीर युगों का तिमिर-आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन! सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन, आज खुले भारत के … Read more