Mor Na Hoga …Ulloo Honge, Ek Vyaangayaatmak Kavita / Naagaarjun

मोर ना होगा……. उल्लू होंगे, एक व्यांगयात्मक कविता ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा तुम से … Read more

सृष्टि(Srishti) – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

सृष्टि(Srishti) – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत) [ads1] [ads2] मिट्टी का गहरा अंधकार, डूबा है उस में एक बीज वह खो न गया, मिट्टी न बना कोदों, सरसों से शुद्र चीज! उस छोटे उर में छुपे हुए हैं डाल–पात औ’ स्कन्ध–मूल गहरी हरीतिमा की संसृति बहु रूप–रंग, फल और फूल! वह है मुट्ठी में बंद किये … Read more

मैं सबसे छोटी होऊं – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

मैं सबसे छोटी होऊँ तेरी गोदी में सोऊँ तेरा आँचल पकड़-पकड़कर फिरू सदा माँ तेरे साथ कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ बड़ा बनाकर पहले हमको तू पीछे छलती है माँ हाथ पकड़ फिर सदा हमारे साथ नहीं फिरती दिन-रात अपने कर से खिला, धुला मुख धूल पोंछ, सज्जित कर गात थमा खिलौने, नहीं सुनाती हमें … Read more